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| भक्त कवि रहीम दास |
प्रेम को अगर समझना हो तो रहीम
के दोहों को पढ़ा जाना बहुत जरूरी है। रहीम का जो प्रेम है वह व्यापक अर्थ में है
। उनका प्रेम ईश्वर से लेकर प्रकृति में जितने भी जीव जगत से जुड़े प्राणी हैं, पशु
पक्षी हैं ,
पेड़ पौधे हैं ,उन
सबके बीच रहकर उनसे संवाद करना है। उनकी सुरक्षा को लेकर हर सम्भव सचेत रहना, उनके
साथ संवेदनशील संबंध रखना ही प्रेम का बृहद रूप है। आज का मनुष्य प्रेम के इकहरे
अर्थ पर ही विश्वास करता है। स्त्री और पुरुष के मध्य प्रेम को
ही वह प्रेम समझता है। रहीम के दोहे हमें प्रेम का व्यापक अर्थ समझाते हैं। रहीम
प्रेम मार्गी कवि हैं ।वे हमें ईश्वर से प्रेम करना सिखाते हैं। वे हमें ईश्वर तक
पहुंचने का रास्ता दिखाते हैं ।वे हमें ईश्वर तक पहुंचना सिखाते हैं ।वे हमें एक
संवेदनशील मनुष्य बनकर समाज के लिए उपयोगी बनना सिखाते हैं।
रहीम के दोहे सुंदर हैं , उनमें
गहन अर्थबोध है । भक्ति-रस से परिपूर्ण इन दोहों में कविता के सारे तत्व मौजूद
हैं। रहीम द्वारा इन दोहों में बरता गया एक-एक शब्द प्रेम के रस में डूबा हुआ
प्रतीत होता है। रहीम के दोहों से ब्रज की मिट्टी की खुश्बू आती है।जो रहीम दास को
पढ़ता है,
वह उन्हें पढ़ता ही चला जाता है । उनके काव्य में
ऐसा शब्द और भाव माधुर्य है कि उन्हें पढ़ते हुए हम प्रेम और भक्ति रस में डूब
जाते हैं। उनके दोहे जीवन जीने की कला सिखाते हैं। प्रेम पर केंद्रित इन दोहों को
पढ़िए और प्रेम की व्यापकता को जीवन में जगह दीजिए-
‘रहिमन’ पैड़ा प्रेम को, निपट सिलसिली गैल।
बिलछत पांव पिपीलिको, लोग लदावत बैल ॥1॥
प्रेम की गली में कितनी ज्यादा
फिसलन है। चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं इस पर , और
हम लोगों को तो देखो, जो बैल लादकर चलने की सोचते
हैं। दुनिया भर का अहंकार सिर पर लाद कर कोई कैसे प्रेम के विकट मार्ग पर चल सकता
है?
वह तो फिसलेगा ही।
‘रहिमन’ धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गांठ पड़ जाय ॥2॥
बडा ही नाजुक है प्रेम का यह
धागा । झटका देकर इसे मत तोड़ो, भाई
टूट गया तो फिर जुड़ेगा नहीं, और
जोड़ भी लिया तो गांठ पड़ जाएगी। प्रिय और प्रेमी के बीच दुराव आ जायगा ।
‘रहिमन’ प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून ॥3।।
सराहना ऐसे ही प्रेम की जाय
जिसमें अन्तर न रह जाय । चूना और हल्दी मिलकर अपना-अपना रंग छोड़ देते है। न
दृष्टा रहता है और न दृश्य, दोनों
एकाकार हो जाते हैं ।
कहा करौ वैकुण्ठ लै, कल्पवृच्छ की छांह।
‘रहिमन’ ढाक सुहावनो, जो गल पीतम-बाँह ॥4 ॥
वैकुण्ठ जाकर कल्पवृक्ष की छांह
तले बैठने में रक्खा क्या है, यदि
वहां प्रियतम पास न हो। उससे तो ढाक का पेड़ ही सुखदायक है, यदि
उसकी छांह में प्रियतम के साथ गलबाँह देकर बैठने को मिले ।
जे सुलगे ते बुझ गए, बुझे ते सुलगे नाहि।
‘रहिमन’ दाहे प्रेम के, बुझि-बुझिझै सुलगाहि
॥5॥
आग में पडकर लकड़ी सुलग-सुलगकर
बुझ जाती है,
बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में
दग्ध हो जाने वाले प्रेमीजन बुझकर भी सुलगते रहते हैं । ऐसे प्रेमी ही असल में ‘मरजीवा’ हैं।
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
‘रहिमन’ फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ताहार ॥ 6॥
अपना प्रिय एक बार तो क्या, सौ
बार भी रूठ जाए तो भी उसे मना लेना चाहिए । मोतियों के हार टूट जाने पर धागे में
मोतियों को बार-बार पिरो लेते हैं न।
यह न ‘रहीम’ सराहिये, देन-लेन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिये, हार होय के जीत ॥7॥
ऐसे प्रेम को कौन सराहेगा, जिसमें
लेन-देन का नाता जुड़ा हो। प्रेम
क्या कोई खरीद-फरोख्त की चीज है? उसमें
तो लगा दिया जाय प्राणों का दांव, परवाह
नहीं कि हार हो या जीत।
‘रहिमन’ मैन-तुरंग चढि, चलिबो पावक माहि।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहि ॥8॥
प्रेम का मार्ग हर कोई नहीं तय
कर सकता। बड़ा कठिन है उस पर चलना। यह उसी तरह है जैसे मोम के बने घोड़े पर सवार
होकर आग पर चलना।
वहै प्रीत नहि रीति वह, नहीं पाछिलो हेत।
घटत-घटत ‘रहिमन’ घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत
॥9॥
कौन उसे प्रेम कहेगा, जो धीरे-धीरे घट जाता है? प्रेम तो वह है जो एक बार किया, तो घटना कैसा? वह रेत तो है नहीं, जो हाथ में लेने पर छन-छनकर गिर जाय। रहीम कहते हैं कि प्रीति की रीति बिलकुल ही निराली है।
रहीम दास के इन प्रेम के दोहों
को पढ़ने के पूर्व मन में जो कच्ची पक्की अनुभूतियां होती हैं , इन
दोहों को पढ़ने के उपरांत वो अनुभूतियां परिपक्व अनुभूतियों में बदलने लग जाती
हैं। हम भीतर से थोड़ा ऐसा महसूस करते हैं कि हमारा असल रास्ता प्रेम का ही रास्ता
है जो हमें ईश्वर तक ले जा सकता है ।जय श्री कृष्ण।
रहीम दास का परिचय
पूरा नाम : अब्दुलर्रहीम खानखाना
जन्म : 17 दिसंबर 1556 ईस्वी
जन्म स्थान : लाहौर (अब पाकिस्तान)
माता का नाम: सुल्ताना बेगम
पिता का नाम : बैरम खां
कर्मभूमि : दिल्ली
(भारत)
उपलब्धि : कवि, अकबर के नवरत्नों में से एक
भाषा शैली : इनकी
शैली अत्यंत सरस, सरल एवं बोधगम्य
विधा
: दोहा और कविता
धर्म
: इस्लाम
मृत्यु : 1 अक्टूबर 1627 (70 वर्ष की उम्र में) आगरा
रचनाएं : रहीम
सतसई, श्रृंगार सतसई, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी,रहीम रत्नावली एवं बरवै नायिका।
-प्रतिमा शर्मा

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