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राधा-कृष्ण के प्रेम और विछोह की मार्मिक कथा

राधा कृष्ण का अविभाज्य स्वरूप  कृष्ण बचपन में प्यारी प्यारी शैतानियाँ किया करते थे । एक बार सजा के बतौर कृष्ण की माता यशोदा ने कृष्ण को ओखल से बाँध दिया तब ठीक उसी समय राधा वहां आ पहुँची । राधा की कृष्ण से यह पहली मुलाकात थी । कृष्ण को देखकर राधा को उनसे प्रेम हो गया । उनके मिलन की यूं तो अलग अलग कई कहानियाँ हैं। कई जगह लोगों ने उल्लेख किया है कि राधा पहली बार गोकुल अपने पिता वृषभानु जी के साथ आई थी तब श्रीकृष्ण को उन्होंने पहली बार देखा था।इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि पहली बार संकेत तीर्थ पर दोनों आपस में मिले थे । बहरहाल ओखल से बंधे कृष्ण को देखकर राधा के दिल में प्यार उमड़ आया , उन्हें लगा कि उनका रिश्ता तो जन्म जन्म का है । कृष्ण के भीतर भी राधा के लिए वही प्यार उमड़ने लगा । दोनों एक दूसरे को देखकर एकदम बेसुध होने लगे थे । भक्त और भगवान का रिश्ता जन्म जन्म का होता है , जब भक्त और भगवान साक्षात मिलते हैं तो आपस में बातें नहीं होतीं बल्कि वे एक दूसरे को दिल से , भाव से महसूस करते हैं । राधा और कृष्ण का प्रेम भी भावों पर आधारित प्रेम है जो अद्वितीय है और उसका कोई विकल्प नहीं है। ...

लक्ष्मण के जीवन से जुड़ी ग्यारह ख़ास बातें

राम सीता हनुमान के साथ लक्ष्मण    रामायण के एक विशेष पात्र हैं लक्ष्मण ।लक्ष्मण का जीवन सदाचार,दृढ निश्चयी,आज्ञाकारिता जैसे अनेक गुणों से परिपूर्ण है।आईये उनके जीवन से जुड़े ग्यारह प्रसंगों को यहाँ हम देखने की कोशिश करते हैं -       1. शेषनाग के अवतार हैं लक्ष्मण रामायण के एक मुख्य पात्र एवं राम के प्रिय लक्ष्मण शेषनाग के एक अवतार हैं ।  वह शेषनाग जिस पर भगवान विष्णु क्षीरसागर में विश्राम करते हैं , क्षीर सागर याने जो दूध का सागर है। शेषनाग सभी नागों के राजा हैं। ऎसी मान्यता है कि वे   ब्रह्मांड के सभी ग्रहों को अपने फन पर रखते हैं । शेषनाग और भगवान विष्णु को अलग अलग नहीं किया जा सकता , ये स्वयं में अविभाज्य स्वरूप हैं। भगवान विष्णु को अक्सर शेषनाग पर आराम करने के रूप में चित्रित किया जाता है , जब भगवान विष्णु राम के रूप में पृथ्वी पर उतरे , तो शेषनाग उनके साथ लक्ष्मण के रूप में आए। यही कारण है कि मिथिला को नष्ट करने के लिए रावण द्वारा भेजा गया नाग ‘ ताटिक ’ लक्ष्मण को देखकर भागते हुए दिखाई देता है । 2. लक्ष्मण का एक अवतार बलराम के रूप में ह...

महर्षि वाल्मीकि का जीवन : डाकू से संत बनने की कहानी

बाल्मीकि रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती हर वर्ष आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को मनाई जाती है।  हिंदू  धर्म में वाल्मीकि जयंती का बहुत महत्व है क्योंकि वाल्मीकि जी का संपूर्ण जीवन काल बदलावों से भरा हुआ है। उन्होंने रामायण जैसे महान ग्रंथ की रचना भी की है।उनके जीवन से हमें कुछ न कुछ सीखते रहने के लिए प्रेरणा मिलती है।जीवन को अच्छा और बेहतर बनाने की प्रेरणा मिलती है। राम नाम की कठोर साधना में लीन डाकू रत्नाकर जो एक दिन महर्षि बन गया वाल्मीकि जयंती पूरे भारत वर्ष में धूम-धाम से लोआ ग मनाते हैं।इस दिन जगह जगह लोग रामायण का पाठ करते हैं और भंडारा का आयोजन कर लोगों को भोजन करवाते हैं। इतने सारे लोगों के एक साथ आकर भोजन करने औऱ रामायण पाठ करने से यह दिवस सामाजिक सद्भाव दिवस के रूप में भी लोगों के सामने दिखाई पड़ता है।उत्तर भारत में यह दिन बहुत महत्व का दिन होता है।आइए वाल्मीकि जी के जीवन से जुड़ी कुछ बातों के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाते हैं... पहले क्या था वाल्मीकि जी का असली नाम यह एक दिलचस्प प्रसंग है कि पहले वाल्मीकि जी का वास्तविक नाम रत्नाकर था। महर्षि से पहल...