काकभुशुण्डि कौन है
काकभुशुण्डि रामचरितमानस का एक ऐसा पात्र है जो लोगों के मन में निरंतर जिज्ञासाएं पैदा करने लगता है । गोस्वामी तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड से यह जानकारी सुलभ होती है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी तो था ही उसके साथ-साथ वह राम का भक्त भी था । काकभुशुण्डि के बारे में शास्त्रों में जो जानकारियाँ मिलती हैं उसके अनुसार वह अपने पूर्व जन्म में अयोध्या का रहने वाला था और एक शुद्र कुल से उसका सम्बन्ध था।उस जन्म में भी भगवान शिव के एक उत्साही भक्त के रूप में उसे जाना जाता है।यह कथा भी प्रचलित है कि काकभुशुण्डि को अपने गुरु के अनादर करने के कारण भगवान शिव से श्राप मिला था । यह कथा इस तरह है कि काकभुशुण्डि के मन में अहंकार हो गया था और अहंकार के वशीभूत होकर वह शिव को छोड़कर अन्य देवताओं की निंदा किया करता था । एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वह उज्जैन आया हुआ था। वहां वह एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करते हुये उन्हीं के संरक्षण में साथ रहने लगा । वह ब्राम्हण अत्यंत सज्जन था और काकभुशुण्डि ने उसे अपना गुरु मान लिया ।
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| रामायण का अलहदा पात्र काकभुशुण्डि |
काकभुशुण्डि को श्राप क्यों मिला
एक बार काकभुशुण्डि ने भगवान शंकर के मंदिर में ही अपने गुरु ब्राह्मण का इसलिए अपमान कर दिया क्योंकि मंदिर में वह अन्य देवी देवताओं की पूजा आराधना कर रहा था । भगवान शंकर अपने भक्त काकभुशुण्डि के इस व्यवहार से क्रोधित हो उठे ।भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके उसे श्राप दे दिया कि तुमने गुरु का निरादर किया है । श्राप में काकभुशुण्डि को सर्प की अधम योनि मिली ।
भगवान शंकर की आकाशवाणी में यह
भी कहा गया कि सर्प योनि के बाद एक हजार बार उसे अनेक योनियों में जन्म
लेना पड़ेगा। काकभुशुण्डि का गुरु बड़ा ही दयालु
था इसलिये उसने शिव जी की स्तुति करके अपने शिष्य के लिये बार-बार क्षमा प्रार्थना
की। गुरु के द्वारा क्षमा याचना करने पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके फिर कहा
- 'गुरुवर ब्राह्मण ! अब मेरे बस में कुछ नहीं ! मेरे मुख से निकला हुआ
श्राप अब किसी भी सूरत में व्यर्थ नहीं जा सकता।
इसको विभिन्न
योनियों में एक हजार बार जन्म तो लेना ही पड़ेगा किन्तु जन्म लेने और मरने में जो
दुःख होता है वह इसे नहीं होगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। इसे
अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा ।जगत में इसे कुछ भी दुर्लभ न होगा और इसकी
अबाध गति सर्वत्र बनी रहेगी | मेरी कृपा से इसे भगवान श्री राम के चरणों में भक्ति
प्राप्त प्राप्त करने का सौभाग्य मिलेगा।'
भगवान शंकर की बातें सुनकर गुरुवर ब्राम्हण को संतोष हुआ । काकभुशुण्डि को लेकर उसके मन की चिंता थोड़ी कम हुई ।
काकभुशुण्डि ने राम कथा सुनाकर
गरुड़ के मन का संदेह दूर किया
काकभुशुण्डि को भगवान शिव की
कृपा से हर जन्म की याद हमेशा बनी रही। समय के साथ श्री राम जी के प्रति भक्ति भी
उसमें उत्पन्न हो गई। शूद्र कुल से सम्बन्ध रखने वाले काकभुशुण्डि ने अंतिम जन्म
में ब्राह्मण का शरीर पाया। ब्राह्मण बनने पर ज्ञानप्राप्ति के लिए वह लोमश नामक ऋषि
के पास गया।
जब लोमश
ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था। उसके इस
व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने भी उसे श्राप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी
(कौआ) हो जा। इस श्राप के करण वह तत्काल कौआ बनकर वहां से उड़ गया।
लोमश ऋषि
ने काकभुशुण्डि को क्रोधवश श्राप तो दे दिया पर जब उनका मन शांत हुआ तो उन्हें
भारी पश्चाताप हुआ । मन के पश्चाताप से मुक्ति के लिए उन्होंने उस कौए को वापस
बुलाकर राममंत्र दिया और साथ में इच्छा मृत्यु का वरदान भी उसे दे दिया ।
लोमश
ऋषि के श्राप के बाद काकभुशुण्डि ने कौवे के रूप में ही अपना संपूर्ण जीवन
व्यतीत किया। यह कथा भी आती है कि महर्षि वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने
रामायण की कथा गिद्धराज गरूड़ को सुना दी थी।
राम रावण युद्ध
के दौरान जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम
से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के
कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के
बंधन से मुक्त कर किया था। पर गरूड़ को भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने
पर उनके भगवान होने पर ही उसे संदेह हो गया। गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए
देवर्षि नारद ने उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा था । ब्रह्मा जी ने उनको शंकर जी
के पास भेजा । अंत में भगवान शंकर ने भगवान राम को लेकर गरूड़ के मन के भीतर जन्मे
संदेह को मिटाने के लिए उसे काकभुशुण्डि के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डि ने ही
राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के मन के भीतर जन्मे संदेह को दूर किया।
काकभुशुण्डि जैसे पात्र की महत्ता आज हमारे जीवन में क्यों है
काकभुशुण्डि के जीवन की यह कथा उसके जीवन में आए उतार चढ़ाव से भरी हुई है । अन्ततः यह रामायण का एक ऐसा विरला पात्र है जो अपने जीवन में आए उतार चढ़ाव के बाद भी अपना महत्त्व नहीं खोता ।बिषम परिस्थितियों में भी उसके जीवन से ईश्वर की कृपा नहीं जाती । शुद्र कुल का होकर , कौवा बनकर भी वह अपने जन्म लेने की सार्थकता सिद्ध करता है। एक बात और कि हम सब लोग गरुड़ पक्षी के समान हैं जिसके मन में हमेशा ईश्वर को लेकर संदेह बना रहता है।हमें भी अपने जीवन में कोई काकभुशुण्डि जैसा पात्र चाहिए जो हमारे मन के भीतर उठ रहे संदेह को दूर कर दे ।
-प्रतिमा शर्मा
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