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राधा-कृष्ण के प्रेम और विछोह की मार्मिक कथा

राधा कृष्ण का अविभाज्य स्वरूप  कृष्ण बचपन में प्यारी प्यारी शैतानियाँ किया करते थे । एक बार सजा के बतौर कृष्ण की माता यशोदा ने कृष्ण को ओखल से बाँध दिया तब ठीक उसी समय राधा वहां आ पहुँची । राधा की कृष्ण से यह पहली मुलाकात थी । कृष्ण को देखकर राधा को उनसे प्रेम हो गया । उनके मिलन की यूं तो अलग अलग कई कहानियाँ हैं। कई जगह लोगों ने उल्लेख किया है कि राधा पहली बार गोकुल अपने पिता वृषभानु जी के साथ आई थी तब श्रीकृष्ण को उन्होंने पहली बार देखा था।इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि पहली बार संकेत तीर्थ पर दोनों आपस में मिले थे । बहरहाल ओखल से बंधे कृष्ण को देखकर राधा के दिल में प्यार उमड़ आया , उन्हें लगा कि उनका रिश्ता तो जन्म जन्म का है । कृष्ण के भीतर भी राधा के लिए वही प्यार उमड़ने लगा । दोनों एक दूसरे को देखकर एकदम बेसुध होने लगे थे । भक्त और भगवान का रिश्ता जन्म जन्म का होता है , जब भक्त और भगवान साक्षात मिलते हैं तो आपस में बातें नहीं होतीं बल्कि वे एक दूसरे को दिल से , भाव से महसूस करते हैं । राधा और कृष्ण का प्रेम भी भावों पर आधारित प्रेम है जो अद्वितीय है और उसका कोई विकल्प नहीं है। ...

हनुमान चालीसा की रचना और दिलचस्प किवदंतियां

हनुमान चालीसा की रचना के कारणों के पीछे बहुत सी किवदंतियां प्रचलित हैं।पर अब तक जितनी  भी जानकारियाँ उपलब्ध हैं उसके मुताबिक मुग़ल सम्राट अकबर ने एक बार तुलसी दास को फ़तेहपुर सिकरी जेल में बंद करवा दिया था और उसी कारागृह में चालीस दिन तक रहते हुए तुलसी दास ने हनुमान जी की आराधना करते हुए हनुमान चालीसा की रचना की थी।

 
गोस्वामी तुलसी दास 

अब यह जानना दिलचस्प है कि मुग़ल सम्राट अकबर ने तुलसी दास को आखिर कारावास में क्यों डलवाया था । इसके पीछे दो तरह की किवदंतियां सुनने को हमें मिलती हैं। यद्यपि इसकी कोई प्रमाणिकता उपलब्ध नहीं है फिर भी किवदंती अनुसार ये माना जाता है कि ईश्वरीय कृपा से तुलसीदास जी के भीतर बहुत सी चमत्कारिक शक्तियां मौजूद थीं । एक बार एक मरे हुए ब्राह्मण को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान की ओर ले जाया जा रहा था और उसी श्मशान के रास्ते से होकर  तुलसीदास जी भी  जा रहे थे ।उसी समय एक विधवा औरत ने तुलसीदास जी के पैरों पर  गिरकर उन्हें प्रणाम किया और फिर रोने लगी। तुलसीदास जी को कुछ समझ में नहीं आया और उन्होंने  उस दुखी औरत को 'सदा सौभाग्यवती  भव' का आशीर्वाद दे दिया। उस समय उस औरत ने दुखी मन से कहा... मैं सदा सौभाग्यवती कैसे हो सकती हूँ ? मेरे पति तो अब  मर चुके  हैं और उन्हें श्मशान की ओर ले जाया जा रहा है ।उस समय  तुलसीदास ने कहा- ' शब्द ब्रम्ह हैं और मेरे मुख से ये शब्द तो निकल चुके हैं, इसलिए अब उन्हें किसी भी सूरत में जीवित करना पड़ेगा।' तुलसीदास जी ने फिर सबसे अपनी आँखे बंद करने को कहा और राम नाम जपने लगे । उसके बाद किवदंती है कि वह ब्राम्हण जीवित हो उठा। 

तुलसीदास की ख्याति से अभिभूत होकर अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और अपने किसी मृत परिजन को ज़िंदा करने के लिए निवेदन किया। तुलसी दास ने इनकार में कहा कि चमत्कार भी ईश्वर की कृपा अनुसार होते हैं , उसका प्रदर्शन मनुष्य अपने मनमाफिक नहीं कर सकता। यह बात भक्त तुलसीदास की प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रतिकूल थी फिर भी अकबर ने उन्हें जबरदस्ती चमत्कार दिखाने को विवश किया लेकिन ऐसा करने से उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया, फलस्वरूप अकबर ने  तुलसीदास को फतेहपुर सीकरी जेल में कैद करवा दिया।

 

तुलसी दास जी तो राम के भक्त थे इसलिए निर्भय होकर उन्होंने अकबर  के समक्ष  झुकने  के बजाय हनुमान जी का नाम लिया  और 40 दिनों में ही हनुमान चालीसा जेल में रहकर लिख डाला।  वहां फिर एक चमत्कार देखने को मिला । बंदरों ने उस कारागृह को चारों तरफ से घेर लिया और वहां उपद्रव करने लगे। बन्दर, सैनिकों और द्वारपालों को नोचने लगे।  ईंटों को तोड़ने लगे, और सबको उसी ईंट से मारते हुए  भयंकर उपद्रव किया। वहां भय का वातावरण निर्मित हो गया। मातहतों ने अकबर को बताया गया कि यह हनुमान जी का क्रोध है, अब अकबर को  विवश होकर तुलसीदास जी को जेल से मुक्त करना पड़ा और उनसे माफ़ी मांगनी पड़ी। तुलसी दास को मुक्त करते ही बंदरों का आतंक समाप्त हो गया।

 

अकबर द्वारा तुलसी दास जी को जेल में डाले जाने के पीछे दूसरी किंवदंती यह भी है कि एक बार जब मुगल सम्राट अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास जी को शाही दरबार में बुलाया तब तुलसीदास जी की मुलाकात अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना और टोडर मल से हुई। उन्होंने काफी देर तक उनसे बातचीत भी की। दरअसल वे  अकबर की प्रशंसा में तुलसी दास जी से कोई  ग्रंथ लिखवाना चाहते थे लेकिन तुलसीदास जी ने इसके लिए साफ़ मना कर दिया। इस बात से नाराज होकर अकबर ने उन्हें कैद करवा कर कारावास में डलवा दिया । फतेहरपुर सिकरी जेल में तुलसीदास जी करीब 40 दिनों तक कैद में रहे और वहीं रहकर हनुमान चालीसा की रचना की । जहां वे  कैद थे , वह क्षेत्र बंदरों से घिरा हुआ था। बंदरों ने महल परिसर में प्रवेश किया और वहां मौजूद अकबर के सैनिकों को चोट पहुंचाना शुरू कर दिया। जब यह बात अकबर को पता चली तो उसने तुलसीदास को फिर रिहा करने का आदेश दे दिया।

 

इस हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयां हैं जो हनुमान जी की स्तुति में गोस्वामी तुलसीदास जी ने रची हैं। तुलसीदास 16वीं शताब्दी में अवधि बोली के एक महान कवि थे । उन्होंने हनुमान चालीसा की रचना अवधि बोली में ही की है।

आज यह हनुमान चालीसा जन जन में इतना लोकप्रिय है कि यह लोगों को कंठस्थ याद रहता है और लोग ईश प्रार्थना में नित्य इसका पाठ भी करते हैं।

 

- प्रतिमा शर्मा


रामायण की चौपाईयां बनाती हैं जीवन को आसान

 

 

 

 

 

 

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