आत्मदेव, धुंधली के यहां पुत्र धुंधकारी और गोकर्ण के जन्म की कथा एक ऎसी कथा है जहां से मनुष्य को कई परिस्थितियों को जानने समझने की शिक्षा मिलती है । पुत्र मोह में डूबा हुआ व्यक्ति कई बार ऐसे निर्णय लेने लगता है जो उसके लिए आगे चलकर गले की फांस बन जाते हैं । जीवन में दूरदर्शी गुरूओं के सुझाव मनुष्य को मान लेना चाहिए , उनकी बात की अवहेलना करने से भी जीवन में विपत्तियाँ आती हैं ।अगर पत्नी धुंधली की तरह समझदार न होकर जिद्दी और मूर्ख हो तब तो संतान उत्पत्ति के बारे में विचार करना ही मूर्खता साबित होती है जैसा कि इस कथा में घटित होता हुआ हम देखते हैं । विधाता के लिखे को बदला नहीं जा सकता इसलिए उसके द्वारा तय चीजों को बदलने की कोशिश करने से भी जीवन दुखों से भर जाता है । अंत में उसी विधाता की शरण में जाकर ही मुक्ति मिलती है । तो आईये , भागवत पुराण में आए हुए इस कथा को सिलसिलेवार जानने की कोशिश करते हैं -
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| भागवत कथा की महिमा |
संतान के अभाव में व्याकुल ब्राम्हण आत्मदेव की मनः स्थिति
पूर्वकाल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक
अनुपम नगर बसा
हुआ था। वहाँ सभी वर्णो के
लोग अपने-अपने धर्मो का आचरण करते हुए सत्य और सत्कर्मो में तत्पर
रहते थे। उस नगर में समस्त वेदों का विशेषज्ञ और समस्त कर्मो में निपुण
एक आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। उसका व्यक्तित्व सूर्य के
समान तेजस्वी था। वह धनी होते हुए भी भिक्षा पर आश्रित रहने वाला ब्राम्हण था।
उसकी पत्नी 'धुंधली' कुलीन
एवं सुंदर थी
पर हर बात पर अड़ जाने वाली
अपनी आदत के कारण वह एक बदनाम स्त्री थी । उसको लोगों की निंदा करने में सुख मिलता
था। उसका स्वाभाव क्रूर था। बात बात में वह लड़ झगड़ जाने वाली स्त्री थी।वह
गृहकार्य में निपुण जरूर थी पर अत्यंत कृपण थी । इसके बावजूद दोनों पति पत्नी
प्रेम से घर में रहते। उनके पास अर्थ और भोग-बिलास की सामग्री बहुत थी परन्तु उससे
उन्हे कोई भी सुख नसीब नहीं था। जब उनकी अवस्था बहुत ढल गयी, तब
उन्होंते संतान प्राप्ति के लिए तरह तरह के दान पुण्य आदि कार्य किये। इस
प्रकार के
धर्म इत्यादि के कार्यों में उन्होंने
अपना आधा धन समाप्त कर दिया, तो भी उन्हें संतान मुख देखने को नहीं मिला। इन
सबके बाद वह ब्राह्मण बहुत चिंतातुर रहने लगा था।
एक दिन वह ब्राह्मण देवता बहुत दुखी होकर घर से
निकलकर वन को चल दिया। दोपहर के समय उसे प्यास लगी, इसलिये
वह एक तालाब पर आया। सन्तान के अभाव के दुःख ने उसके शरीर बहुत जर्जर कर दिया था, इसलिये
थक जाने के कारण जल पीकर वह वहीँ बैठ गया। दो घड़ी बीतने पर वहाँ एक संन्यासी
महात्मा आये। जब सन्यासी ने देखा कि वे जल पी चुके हैं, तब
वह उनके पास गया और ब्राम्हण देवता के चरणो को स्पर्श करने के बाद
सामने खड़े होकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा। उसे देखकर ब्राह्मण देवता रोने लगे।
सन्यासी ने पूछा–कहो, ब्राह्मण-देवता
! रोते क्यों हो ?
ऐसी तुम्हें क्या चिन्ता
है कि रो रहे हो ?
तुम जल्दी ही मुझे अपने दुःख का कारण बताओ।
ब्राह्मण ने कहा–' महाराज ! मैं
अपने पूर्वजन्म के पापों से संचित दुःख का क्या वर्णन करूं? अब
मेरे पितर मेरे द्वारा अर्पित जल को अपनी चिन्ताजनित साँसों से कुछ गर्म करके पीते
हैं। देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ अन्न, प्रसन्न
मन से स्वीकार नहीं करते। सन्तान के लिये मैं इतना दुखी हो गया हूँ कि मुझे सब
सूना-सूना ही दिखायी देता है। मैं प्राण त्यागने के लिये यहाँ आया हुआ हूँ। मेरे
सन्तान हीन जीवन को मेरा मन खुद ही धिक्कार रहा है। इस सन्तानहीन
घर और संतानहीन धन दौलत को मेरा मन हमेशा धिक्कार रहा है! मैं जिस भी गाय को पालता
हूँ,
वह भी सर्वथा बांझ हो जाती है; जो
पेड़ लगाता हूँ,
उस पर भी फल-फूल नहीं लगते। मेरे घर में जो फल आता
है,
वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है। मैं
ऐसा अभागा पुत्रहीन व्यक्ति हूँ कि इस जीवन को ही रखकर मुझे अब क्या
करना है?
यों कहकर वह ब्राह्मण दुःख से व्याकुल हो उन
संन्यासी महात्मा के पास फूट-फूटकर फिर रोने लगा।
तब उस मुनिवर के हृदय में बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। वे
योगनिष्ठ थे;
उन्होंने उसके ललाट की रेखाएँ देखकर सारा वृतांत
जान लिया और फिर उसे विस्तारपूर्वक बताने लगे।
संन्यासी ने कहा– ब्राह्मण-देवता
! इस संतान प्राप्ति का मोह त्याग दो ।तुम्हारे कर्म की गति प्रबल है, तुम
विवेक का आश्रय लो। मैंने इस समय तुम्हारा प्रारव्ध देखकर जाना है कि सात जन्म तक
तुम्हारे कोई सन्तान नहीं हो सकती। पूर्वकाल में राजा सगर को उनके पुत्रों के कारण
दुःख भोगना पड़ा था। ब्राह्मण ! अब तुम कुटुंब की
आशा छोड़ दो । संन्यास में ही सब प्रकार का सुख है ।
ब्राह्मण ने कहा — महात्मा
जी ! विवेक से मेरा क्या होगा। मुझे तो बल पूर्वक पुत्र ही दीजिये; नहीं
तो मैं आपके सामने ही शोक मूर्च्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ । जिसमें
पुत्र-स्त्री आदि का सुख नहीं है, ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। लोक में सरस तो
पुत्र-पौत्रादि से भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है।
ब्राह्मण का ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधन ने कहा -विधाता
के लेख को मिटाने पर राजा चित्रकेतु को बड़ा दुःख उठाना पड़ा था। उस पुरुष के समान
तुमको भी पुत्र सुख नहीं मिल सकेगा। तुमने तो बड़ा हठ पकड़ रखा है
और अर्थी के रूप में तुम मेरे सामने उपस्थित हो; ऐसी
दशा में मैं तुमसे क्या कहूँ’ ।
जब महात्माजी ने देखा कि यह किसी प्रक्रार अपना
आग्रह नहीं छोड़ रहा है ,
तब उन्होंने उसे एक पेड़ का फल देकर कहा- इसे
तुम अपनी पत्नी को खिला देना, इससे उसकी ओर से एक पुत्र का जन्म होगा । तुम्हारी
स्त्री को एक साल तक सत्य,
शौच, दया, दान
और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखना होगा। यदि वह ऐसा करेगी तो वह बालक बहुत
ही शुद्ध स्वभाव वाला होगा। ये कहकर योगीराज वहां से चले गए और वो ब्राह्मण
आत्मदेव भी ख़ुशी ख़ुशी घर को लौट आया।
आत्म
देव को संतान प्राप्ति के लिए मिला मुनिवर से एक पेड़ का फल
घर आकर आत्मदेव ने मुनिवर से मिले उस फल को अपनी स्त्री को दे दिया और कहीं चला गया। उसकी स्त्री कुटिल स्वभाव की थी, रो रोकर अपनी पड़ोसन सखी से कहने लगी – “सखी” मुझे तो बड़ी चिंता हो गयी है, मैं तो यह फल नहीं खा सकती। ये फल खाने से मेरा गर्भ ठहर जायेगा और मेरा पेट निकल आएगा। मुझसे फिर कुछ भी खाया पीया नहीं जायेगा। मेरी शक्ति भी क्षीण हो जाएगी। अब तू ही बता घर का काम धंधा कौन देखेगा?ये घर कैसे चलेगा? और कही गांव में डाकुओं का आक्रमण हो गया तो एक गर्भिणी स्त्री कैसे भाग पाएगी? और यदि कहीं यह शुकदेव की तरह ही पेट के गर्भ में रह गया तो मैं क्या करुँगी, इसे बाहर कैसे निकाला जायेगा? और यदि प्रसवकाल में कही यह टेड़ा हो गया तो प्राणो से हाथ भी मुझे धोने होंगे। मैं सुकुमारी भला यह सब कैसे सह पाऊंगी । दुर्बल होने की स्थिति में मेरी नंदरानी मेरा सारा माल समेट कर ले जाएगी, और तो और मुझसे ये सत्य, शौंच के नियम भी कैसे पालित हो पाएंगे ? जो स्त्री बच्चे को जन्म देती है , वो बड़ा ही कष्ट भोगती है। मेरे विचार से तो बांझ या विधवा स्त्री ही सुखी रहती है।
मन में ऐसे ही तरह-तरह के कुतर्क उठने से उसने वह ‘फल
नहीं खाया और जब उसके पति ने पूछा— फल
खा लिया ?’
तब उसने कह दिया–‘हाँ, खा
लिया’
एक दिन उसकी बहन अपने-आप ही उसके घर आयी; तब
उसने अपनी बहन को यह वृतांत सुनाकर कहा कि “मेरे मन में इस फल को लेकर बड़ी
चिन्ता है,
मैं इस दुःख के कारण दिनों दिन दुबली हो रही हूँ।
बहन! मैं क्या कहूँ ?”
बहन ने कहा, “मेरे
पेट में बच्चा है,
प्रसव होने पर वह बालक मैं तुझे दे दूँगी। तब तक
तू गर्भवती के समान घर में गुप्त रूप से सुख से रह । तू मेरे पति को कुछ घन दौलत
दे देगी तो वे तुझे अपना बालक भी सौप देंगे। हम ऐसी युक्ति करेंगे कि जिसमें सब
लोग यही कहें कि ‘इसका
बालक छः महीने का होकर मर गया’ और मैं नित्य प्रति तेरे घर आकर उस बालक का
पालन-पोषण करती रहूँगी। तू इस समय इसकी जाँच करने के लिये यह फल गौ को खिला दे ।’
पुत्र
धुंधकारी का आगमन हुआ
ब्राह्मणी ने अपने स्वाभाव वश जो-जो उसकी बहन ने
कहा था,
वैसे ही सब किया। इसके पश्चात् समयानुसार जब उस स्त्री
के पुत्र हुआ,
तब उसके पति ने चुपचाप लाकर उसे धुंधली को
दे दिया और उसने आत्मदेव को सूचना दे दी कि मेरे सुख पूर्वक प्रसव से बालक हो गया
है। इस प्रकार आत्मदेव के यहां पुत्र हुआ सुनकर सब लोगों को बड़ा आनन्द मिला।
ब्राह्मण
ने उसका जातकर्म-संस्कार करके अन्य ब्राह्मणों को
दान पुण्य दिया और उसके द्वार पर गाना बजाना तथा अनेक प्रकार के मांगलिक कृत्य
होने लगे। धुंधली ने अपने पति से कहा – “मेरे स्तनों
में तो दूध ही नहीं है तो फिर मैं इस बालक का गौ के दूध से लालन पालन करुँगी। मेरे
बहन के यहाँ भी संतान का जन्म हुआ था लेकिन वो मर गया है। मैं उसे ही बुला लेती
हूँ ,वो
उसका सही ढंग
से लालन पालन कर सकती है। यह सुनकर अपने पुत्र की
रक्षा के लिए आत्मदेव ने वैसा ही किया। माता
धुंधली ने इस पुत्र का नाम धुंधकारी रखा।
पुत्र
गोकर्ण के जन्म की कथा –
इसी समय ब्राह्मण की गाय के तीन महीने बीत जाने पर
एक मनुष्य आकार का बच्चा पैदा हुआ। वह सर्वांग सुन्दर, दिव्य, निर्मल
तथा सुवर्ण की कांति से दीप्त था।
उसे देखकर ब्राह्मण देवता को वड़ा आनन्द मिला और
उसने स्वयं ही उसके सब संस्कार किये। इस समाचार से अन्य सभी लोगों को भी बड़ा
आश्चर्य हुआ और वे बालक को देखने के लिये आये तथा आपस में कहने लगे,’ देखो, भाई
! आत्मदेव का कैसा भाग्य उदय हुआ है! कैसे आश्चर्य की बात है कि गौ का भी ऐसा
दिव्यरूप बालक उत्पन्न हुआ है’ दैवयोग से इस गुप्त रहस्थ का किसी को भी पता न
लगा। आत्मदेव ने उस बालक के गौ की तरह कान देखकर उसका नाम ‘गोकर्ण’ रख
दिया।
काल बीतने पर वे दोनों बालक जवान हो गये। उनमें
गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ, किन्तु
धुंधकारी बड़ा ही दुष्ट निकला। खान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारों
का उसमें नामोंनिशान भी न था और न खान-पान का ही कोई परहेज उसे था । क्रोध
उसमें बहुत बढ़-चढ़कर भरा हुआ था। वह हमेशा बुरी वस्तुओं का संग्रह किया करता था। दूसरों
के यहां चोरी करना और सब लोगों से द्वेष रखना उसका स्वभाव बन गया था! छिपे-छिपे वह
दूसरों के घरों में आग भी लगा देता था।
वह इतना दुष्ट था कि दूसरों के बालको को खिलाने के
लिये गोद में लेता और उन्हें चट से कुएँ में डाल देता था। हिंसा
का उसे व्यसन-सा हो गया था। हर समय वह अस्त्र शस्त्र धारण
किये रहता और बेचारे अंधे और दीन-दुखियों को व्यर्थ में तंग करता था।
चाण्डालों से उसे विशेष प्रेम था; बस
हाथ में फंदा लिये कुत्तों की टोली के साथ शिकार की टोह में घूमते रहना उसका शौक
था।
वेश्याओं के जाल में फंसकर उसने धीरे-धीरे अपने
पिता की सारी सम्पत्ति नष्ट कर दी। एक दिन माता-पिता को मार-पीटकर घर के सब
बर्तन-भाड़े वह उठा ले गया।
इस प्रकार जब सारी सम्पत्ति स्वाहा हो गयी, तब
उसका कृपण पिता फूट-फूटकर रोने लगा और बोला–‘इससे
तो इसकी माँ का बांझ रहना ही अच्छा था; कुपुत्र
तो बड़ा ही दुःखदायी होता है। अब मैं कहाँ रहूँ? कहाँ
जाऊँ ?
मेरे इस संकट को कौन दूर करेगा ? हाय
राम ! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, इस
दुःख के कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ने पड़ेंगे।
गोकर्ण
द्वारा अपने पिता आत्मदेव को वैराग्य का ज्ञान देकर भगवत भजन हेतु प्रेरित करना-
उसी समय परम ज्ञानी गोकर्ण जी वहाँ आये और
उन्होंने पिता को वैराग्य का उपदेश देते हुए बहुत कुछ समझाया। वे
बोले- 'पिताजी
! यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुःख स्वरूप और मोह में डालने वाला है। पुत्र
किसका ?
धन किसका? स्नेहवान
पुरुष रात-दिन दीपक के समान जलता रहता है। सुख न तो इंद्र को है और न
चक्रवर्ती
राजा को ही सुख है। सुख है तो केवल विरक्त, एकान्तजीवी
मुनि को।
‘यह मेरा पुत्र है’ इस
अज्ञान को आप छोड़ दीजिये। मोह से नरक की प्राप्ति होती है। यह शरीर तो
नष्ट होगा ही। गोकर्ण की ज्ञान से भरी बातें सुनकर वह सब कुछ छोड़ वन में चले जाने
को तैयार हो गया और उनसे कहने लगा- 'बेटा ! वन में रहकर मुझे क्या
करना चाहिये,
यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो। मैं
बड़ा मूर्ख हूँ। अब तक कर्मवश स्नेहपाश में बंधा हुआ इस घर रूपी अँधेरे कुएँ में
ही पड़ा रहा हूँ। तुम बड़े दयालु हो, इन
सबसे मेरा उद्धार करो।'
गोकर्ण ने कहा–'पिताजी
! यह शरीर हड्डी,
मांस और रुधिर का पिण्ड है; इसे
आप “मैं” मानना
छोड़ दें और स्त्री-पुत्रादि को ‘अपना’ कभी
न मानें। इस संसार को रात-दिन क्षणभंगुर ही देखें, इसकी
किसी भी वस्तु को स्थायी समझकर उससे राग न करें। बस, एकमात्र
वैराग्य-रस के रसिक होकर भगवान की भक्ति में लगे रहें।भगवत भजन ही सबसे बड़ा धर्म
है,
निरन्तर उसी का आश्रय लिये रहें। अन्य सब प्रकार
के लौकिक धर्मो
से मुख मोड़ लें। सदा साधुजनों की सेवा करें।
भोगों की लालसा को पास न फटकने दें तथा जल्दी-से-जल्दी दूसरों के गुण-दोषों का
विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान की कथाओ के रस का ही पान करें।'
इस प्रकार पुत्र की वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेव
ने घर छोड़ दिया और वन की यात्रा आरम्भ की। यद्यपि उनकी आयु उस समय साठ
वर्ष की हो चुकी थी,
फिर भी बुद्धि में पूरी टृढ़ता थी। वहाँ रात-दिन
भगवान की सेवा आराधना करने से और नियम पूर्वक भागवत के दशम स्कन्ध का पाठ करने से
उसने भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र को अपने इस जन्म में प्राप्त
कर लिया और उसे मुक्ति मिली।
धुंधकारी का दु:खद अंत
धुंधकारी का मूल पेशा चोरी का रहता है। एक बार वेश्याओं की जरूरतों की पूर्ति हेतु धुंधकारी राजा के यहाँ चोरी करता है। जब इस बात की खबर वेश्याओं को होती है तो वे डर जाती हैं । अपने बिरूद्ध सबूत नष्ट करने के लिए धुंधकारी को खाट में बांधकर वे आग लगा देती हैं। धुंधकारी तड़प तड़प कर मरता है और प्रेत बन जाता है।
धुंधली का दु:खद अंत
पति के वन गमन करने एवं धुंधकारी के आचरण से पीड़ित धुंधली, उसकी मृत्यु की खबर के बाद व्याकुल होकर कुँए में कूदकर आत्महत्या कर लेती है।
भागवत की यह कथा मनुष्य जीवन में किए गए गलत आचरण और उसके बाद के परिणामों को लेकर एक भयावह दृश्य रचती है। धुंधकारी के प्रेत को गोकर्ण भागवत की कथा सुनाते हैं , तब कहीं जाकर उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। इस कथा में गोकर्ण एक ऐसा पात्र है जो सद्गुणों का प्रतीक है और वही मनुष्य को मुक्ति दिलाता है।
-प्रतिमा शर्मा

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