जब भी शबरी का प्रसंग छिड़ता है तो शबरी को लेकर मन की जिज्ञासाएं कभी शांत होने का नाम नहीं लेतीं। हिंदू धर्म शास्त्रों में खासकर रामायण में, शबरी का जो चरित्र है , इस चरित्र को हम त्याग और भक्ति का चरम रूप मानते हैं। एक प्रसंग यह भी आता है कि शबरी विवाह करना नहीं चाहती थी। जब उसके पिता ने उसका विवाह करना चाहा तो वह घर से भाग गई। स्त्रियां विवाह करना न चाहती हों, ऐसा बहुत कम प्रसंग सुनने को मिलता है। जब तक कोई विशेष कारण ना हो, वे विवाह को अमूमन स्वीकार ही करती हैं। शबरी के विवाह न करने के पीछे ऐसा कौन सा कारण है कि उसने विवाह को अस्वीकार किया । इस प्रसंग को लेकर ज्यादातर लोगों की जिज्ञासाएं शांत नहीं होतीं।
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| भगवान राम की शरण में माता शबरी |
शबरी के बारे में जो जानकारियां स्त्रोतों से प्राप्त होती हैं उसके अनुसार वह राजा शबर की बेटी थी । राजा शबर भील आदिवासी जाति से आते थे। उनकी पुत्री होने की वजह से शबरी भीलनी जाति की आदिवासी स्त्री थी। तत्कालीन समय में जब कोई भी शुभ कार्य होता था तो उनके समुदाय में पशुओं की बलि दी जाती थी। शबरी भी इस बात से आशंकित थी कि उसकी जब शादी होगी तो बहुत से पशुओं की बलि दी जाएगी। शबरी बचपन से दयालु स्वभाव की स्त्री थी। उसकी रगों में दया ,करुणा और प्रेम का लहू बहता था। वह नहीं चाहती थी कि उसकी शादी में पशुओं की बलि दी जाए। भील समुदाय के नियमानुसार अगर उसकी शादी होती तो पशुओं की बलि चढ़ाई जानी तय थी। इसीलिए उसने फैसला किया कि वह शादी नहीं करेगी । जब शादी तय हो गयी , विवाह उत्सव शुरू होने ही वाला था , तब भेड़ बकरी जैसे पशुओं को घर में लाकर बांध दिया गया। विवाह उत्सव में इन्हीं पशुओं की बलि दी जानी थी।उनका मांस भोजन के रूप में परोसा जाना था । शबरी यह सब देख नहीं सकती थी । इन परिस्थितियों की वजह से विवाह के ठीक पहले शबरी एक दिन घर से निकलकर घने जंगल की ओर चल पड़ी। इस कठोर निर्णय के पूर्व शबरी को यह मालूम था कि यदि उसने अपने मन की बात सुनी तो फिर कभी अपने कबीले में वापिस स्वीकार नहीं की जाएगी । शबरी का हृदय बहुत कोमल था । इतना कोमल कि शबरी ने पशुओं को बचाने के लिए ही अपने जीवन में इतना बड़ा निर्णय लिया।
यह निर्णय इतना भी आसान नहीं था । एक सामान्य मनुष्य इस तरह का निर्णय अपने जीवन में कभी भी नहीं ले सकता। लेकिन शबरी एक असाधारण स्त्री थी। उसका जन्म दुनिया में लोगों के बीच ईश्वर भक्ति का संचार करने के लिए ही हुआ था।
शबरी वन में जाकर भटकती रही। बहुत से ऋषियों ने अपने आश्रम में उसे संरक्षण देने से मना कर दिया क्योंकि वह एक आदिवासी भील स्त्री थी। उस पर तो आखिर ईश्वर की कृपा थी, इसलिए उसे मतंग ऋषि जैसे योग्य गुरु का संरक्षण प्राप्त हुआ। मतंग ऋषि ने अपने ज्ञान की कृपा उस पर सतत बरसाई, उसे पितृ तुल्य संरक्षण दिया और निर्वाण के समय जाते जाते कहा कि एक दिन तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर राम तुम्हें खोजते हुए यहां आएंगे और तुम्हें मोक्ष प्रदान करेंगे। जो सच्चा भक्त होता है ,सच्चा शिष्य होता है, उसके लिए गुरु के वचन ईश्वर वाक्य की तरह होते हैं।
गुरु के कहे गए वचन शबरी के लिए ईश्वर के मुख से निकले हुए वचन की तरह थे ।
उस दिन से शबरी राम की प्रतीक्षा में आजीवन आश्रम में उनकी बाट जोहती रही।
शबरी ने दुनिया के सामने विश्वास की स्थापना की ।शबरी का विश्वास इस दुनिया के लिए विश्वास का एक जीवंत उदाहरण है । यही विश्वास हम सबके जीवन में ईश्वर की मौजूदगी को दिखाता है। जीवन से विश्वास अगर चला गया तो हम ईश्वर से एकदम दूर चले जाते हैं। हम रास्ते से भटक जाते हैं । भक्त माता शबरी ने हमें जो रास्ता दिखाया वही जीवन की मुक्ति का रास्ता है। दया, करुणा, प्रेम और त्याग के बिना जीवन की मुक्ति संभव नहीं है।
शबरी प्रसंग से इस बात को भलीभांति समझा जा सकता है।
प्रतिमा शर्मा

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